आधुनिक विश्व में चरवाहे | NCERT Class 9 History Chapter 5 Notes in Hindi (Full Explained)


NCERT Class 9 History Chapter 5 Notes in Hindi (Full Detailed Explanation)
aadhunik vishv mein charwahe class 9 history chapter 5 notes hindi
NCERT Class 9 History Chapter 5 आधुनिक विश्व में चरवाहे के पूर्ण नोट्स (भारत और अफ्रीका के चरवाहों का अध्ययन)


 विषय-सूची (Table of Contents)

प्रस्तावना: आधुनिक समाज में चरवाहों की भूमिका

आधुनिक विश्व के इतिहास में चरवाहों को अक्सर एक विस्मृत अध्याय के रूप में देखा जाता है जब भी हम अर्थव्यवस्था या प्रगति की चर्चा करते हैं, हमारा ध्यान केवल कृषि और बड़े उद्योगों तक सीमित रहता है चरवाहों को अक्सर ऐसा माना जाता है जैसे उनका दौर बीत चुका हो और आज की आधुनिक दुनिया में उनके लिए कोई जगह न हो । लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है; भारत और अफ्रीका जैसे विशाल महाद्वीपों में चरवाही आज भी लाखों लोगों की आजीविका का मुख्य आधार है घुमंतू चरवाहे वे लोग होते हैं जो अपनी रोजी-रोटी के जुगाड़ में एक स्थान से दूसरे स्थान पर निरंतर प्रवास करते रहते हैं उनके पास भेड़-बकरियों के रेवड़, ऊँट या अन्य मवेशी होते हैं, जो न केवल उनकी संपत्ति हैं बल्कि उनके अस्तित्व की पहचान भी हैं । यह लेख उन संघर्षों और बदलावों की गाथा है जो इन समुदायों ने औपनिवेशिक और आधुनिक काल के दौरान झेले हैं।

भारत के पर्वतीय चरवाहा समुदाय

गुज्जर बकरवाल

जम्मू और कश्मीर के गुज्जर बकरवाल समुदाय का इतिहास प्रवास और प्रकृति के साथ गहरे तालमेल की कहानी है उन्नीसवीं सदी में चरागाहों की तलाश में आए ये लोग आज कश्मीर की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं । इनका जीवन पूरी तरह से मौसमी चक्र पर आधारित होता है। जाड़ों में जब ऊँची पहाड़ियाँ बर्फ से ढक जाती हैं, तब ये शिवालिक की निचली पहाड़ियों की सूखी झाड़ियों में अपने जानवरों के लिए चारा ढूँढ़ते हैं जैसे ही अप्रैल का अंत आता है, ये उत्तर की ओर गर्मियों के चरागाहों के लिए प्रस्थान करते हैं इस यात्रा में कई परिवार मिलकर एक 'काफिला' बनाते हैं और पीर पंजाल के कठिन दर्रों को पार करते हुए कश्मीर की घाटी में पहुँचते हैं गर्मियों की पिघलती बर्फ इन इलाकों को उपजाऊ घास से भर देती है, जो मवेशियों के लिए सबसे सेहतमंद खुराक साबित होती है

गद्दी चरवाहे

हिमाचल प्रदेश के गद्दी समुदाय का जीवन भी गुज्जर बकरवालों के समान ही चुनौतीपूर्ण होता है वे भी शिवालिक की निचली पहाड़ियों में जाड़ा बिताते हैं और अप्रैल आते ही लाहौल-स्पीति की ओर चल पड़ते हैं जब ऊँचे पहाड़ों की बर्फ पिघलती है और दर्रे खुल जाते हैं, तो वे अपने रेवड़ लेकर उन घास के मैदानों में जा पहुँचते हैं जिन्हें 'बुग्याल' कहा जाता है सितंबर के महीने में वे वापस नीचे की ओर लौटना शुरू करते हैं वापसी के दौरान वे लाहौल और स्पीति के गाँवों में रुककर गर्मियों की फसल काटते हैं और सर्दियों की फसल की बुवाई करते हैं यह चक्रीय प्रवास न केवल उनके जानवरों को जीवित रखता है, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र को भी पुनर्जीवित होने का समय देता है

भोटिया, शेरपा और किन्नौरी

हिमालय के पूर्वी और मध्य भागों में भोटिया, शेरपा और किन्नौरी जैसे समुदाय भी चरवाही की इसी परंपरा का पालन करते हैं ये सभी समुदाय मौसमी बदलावों के हिसाब से खुद को ढालने में माहिर होते हैं जब एक चरागाह की हरियाली खत्म हो जाती है, तो वे तुरंत दूसरे स्थान की ओर प्रस्थान कर जाते हैं इस निरंतर आवाजाही का सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि चरागाहों का बेहिसाब इस्तेमाल नहीं होता और उनमें दोबारा हरियाली लौटने का अवसर मिलता है

मैदानी, पठारी और रेगिस्तानी चरवाहे

धंगर

महाराष्ट्र के धंगर समुदाय का इतिहास और उनकी जीवनशैली भारतीय पठारी क्षेत्रों की अद्वितीय विशेषता है बीसवीं सदी की शुरुआत में इनकी बड़ी आबादी मुख्य रूप से गड़रिये और कंबल बुनने का काम करती थी धंगर गड़रिये मॉनसून के दौरान महाराष्ट्र के अर्ध-शुष्क मध्य पठारों में रहते थे यह इलाका कँटीली झाड़ियों और बाजरे जैसी फसलों के लिए जाना जाता था मॉनसून के बाद चरागाहों की तलाश में वे पश्चिम की ओर कोंकण के इलाके में चले जाते थे कोंकणी किसान इन चरवाहों का स्वागत इसलिए करते थे क्योंकि धंगरों के मवेशी कटाई के बाद खेतों में बची हुई ठूंठों को खाते थे और उनके गोबर से खेतों को प्राकृतिक खाद मिलती थी मॉनसून की पहली बारिश होते ही धंगर वापस अपने सूखे पठारों की ओर लौट जाते थे क्योंकि उनकी भेड़ें तटीय इलाकों के गीले मौसम को बर्दाश्त नहीं कर पाती थीं

कुरुमा, कुरुबा और गोल्ला

कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के सूखे मध्य पठार कुरुमा, कुरुबा और गोल्ला समुदायों के बसेरे थे यहाँ गोल्ला समुदाय गाय-भैंस पालता था, जबकि कुरुमा और कुरुबा भेड़-बकरियाँ पालते थे और कंबल बुनने का कार्य करते थे पहाड़ी चरवाहों के विपरीत, इन समुदायों का प्रवास सर्दी-गर्मी से नहीं, बल्कि बरसात और सूखे के चक्र से तय होता था सूखे महीनों में वे तटीय इलाकों की ओर चले जाते थे और बरसात शुरू होते ही वापस पठारों की ओर लौट आते थे

बंजारे

बंजारे भारत के सबसे प्रसिद्ध घुमंतू समुदायों में से एक रहे हैं, जो उत्तर प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के कई हिस्सों में सक्रिय थे वे बहुत लंबी दूरियाँ तय करते थे और रास्ते में अनाज व चारे के बदले गाँव वालों को मवेशी और अन्य वस्तुएं बेचते थे वे जहाँ भी जाते, अपने जानवरों के लिए उत्तम चरागाहों की निरंतर खोज में रहते थे

रायका

राजस्थान के थार रेगिस्तान में रहने वाला रायका समुदाय प्रकृति की कठोरता के बीच जीवन जीने का हुनर जानता है इस इलाके में वर्षा अत्यंत कम और अनिश्चित होती है, जिसके कारण खेती की उपज स्थिर नहीं रहती इसीलिए रायका समुदाय खेती के साथ-साथ चरवाही का भी कार्य करता है अक्टूबर के महीने में जब स्थानीय चरागाह सूखने लगते हैं, तो जैसलमेर, बाड़मेर और जोधपुर के रायका नए चरागाहों की तलाश में निकल जाते हैं इनके बीच मारू रायका विशेष रूप से ऊँट पालने के लिए प्रसिद्ध हैं पुष्कर और बलोतरा के ऊँट मेले आज भी उनकी व्यापारिक कुशलता और परंपराओं के गवाह हैं

औपनिवेशिक शासन: चरागाहों पर प्रभाव

परती भूमि नियमावली

ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार की नीतियों ने चरवाहों के जीवन को मौलिक रूप से बदल दिया अंग्रेज अधिकारियों की नजर में चरागाह 'बेकार' जमीन थे क्योंकि उनसे सरकार को कोई लगान नहीं मिलता था अपनी आय बढ़ाने और जूट, कपास व गेहूं जैसे कच्चे माल की आपूर्ति इंग्लैंड को सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने 'परती भूमि विकास नियम' बनाए इसके तहत चरागाहों को छीनकर कृषि भूमि में तब्दील कर दिया गया, जिससे चरवाहों के पास अपने जानवरों को चराने के लिए जगह की भारी कमी हो गई

वन अधिनियम

उन्नीसवीं सदी के मध्य से लागू वन अधिनियमों ने चरवाहों की मुश्किलों को और बढ़ा दिया अंग्रेजों ने जंगलों को 'आरक्षित' घोषित कर दिया जहाँ देवदार और साल जैसी कीमती लकड़ी पैदा होती थी इन जंगलों में चरवाहों के प्रवेश पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई औपनिवेशिक अधिकारियों का मानना था कि मवेशियों के चरने से नए जंगली पौधों की कोपलें नष्ट हो जाती हैं और पेड़ों की बढ़त रुक जाती है अब जंगलों में प्रवेश के लिए उन्हें परमिट लेना पड़ता था, जिसकी समय-सीमा बहुत कम होती थी

अपराधी जनजाति अधिनियम 1871

अंग्रेज अफसर घुमंतू समुदायों को शक की नजर से देखते थे क्योंकि उन्हें एक स्थान पर टिक कर रहने वाले लोगों को नियंत्रित करना आसान लगता था 1871 में 'अपराधी जनजाति अधिनियम' (Criminal Tribes Act) पारित किया गया, जिसके तहत चरवाहों और दस्तकारों के कई समूहों को कुदरती और जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया गया इसके बाद इन समुदायों को खास अधिसूचित गाँवों में रहने पर मजबूर किया गया और उनकी स्वतंत्र आवाजाही पर कड़ी पुलिस निगरानी लगा दी गई

चराई कर

आय बढ़ाने के उद्देश्य से अंग्रेजों ने चरवाहों से उनके प्रत्येक मवेशी पर टैक्स वसूलना शुरू कर दिया देश के ज्यादातर इलाकों में उन्नीसवीं सदी के मध्य से ही 'चराई टैक्स' लागू कर दिया गया था पहले यह वसूली ठेकेदारों के जरिए होती थी जो अधिक से अधिक मुनाफा कमाने के लिए चरवाहों का शोषण करते थे बाद में सरकार ने सीधे कर वसूलना शुरू किया और प्रत्येक चरवाहे को एक 'पास' जारी किया जाने लगा

चरवाहों के जीवन पर प्रभाव

चरागाहों की कमी

जब चरागाहों को खेतों में बदल दिया गया, तो बचे हुए छोटे से चरागाह पर जानवरों का दबाव बहुत बढ़ गया इससे चरागाहों का स्तर गिर गया और घास कम होने लगी पर्याप्त खुराक न मिलने के कारण जानवरों की सेहत गिरने लगी और वे कमजोर हो गए जब अकाल पड़ता, तो ये कमजोर जानवर बड़ी संख्या में दम तोड़ने लगते थे 

प्रवास में बदलाव

चरवाहों ने इन कठिन परिस्थितियों का सामना करने के लिए अपने प्रवास के रास्ते बदल लिए और कई ने जानवरों की संख्या कम कर दी 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद रायका समुदाय सिंधु नदी के किनारे नहीं जा सकता था, इसलिए वे अब हरियाणा के खेतों की ओर रुख करने लगे हैं कुछ धनी चरवाहों ने जमीन खरीदकर खेती शुरू कर दी, जबकि गरीब चरवाहे कर्ज के जाल में फंसकर मजदूर बन गए

अफ्रीका में चरवाहा जीवन

मासाईलैंड का विभाजन

अफ्रीका में दुनिया की आधी से ज्यादा चरवाहा आबादी रहती है मासाई समुदाय पूर्वी अफ्रीका का प्रमुख चरवाहा समूह है 1885 में ब्रिटिश कीनिया और जर्मन तांगान्यिका के बीच खींची गई सरहद ने मासाईलैंड को दो बराबर हिस्सों में बाँट दिया उनके 60 प्रतिशत सबसे अच्छे चरागाह गोरों के बसने के लिए छीन लिए गए और उन्हें सूखे व पथरीले इलाकों में कैद कर दिया गया

राष्ट्रीय उद्यानों का प्रभाव

मासाइयों के बहुत सारे पारंपरिक चरागाहों को नेशनल पार्क और शिकारगाह बना दिया गया, जैसे कीनिया में मासाई मारा और तंजानिया में सेरेन्गेटी पार्क इन इलाकों में अब चरवाहों का प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित था, जिसके कारण उनके पशुधन के लिए चारे का संकट स्थायी हो गया 

व्यापारिक प्रतिबंध

औपनिवेशिक सरकार ने चरवाहों की आवाजाही पर कड़ी पाबंदियाँ लगा दीं उन्हें विशेष परमिट के बिना बाहर जाने की अनुमति नहीं थी और गोरों के इलाकों के बाज़ारों में दाखिल होने से भी रोक दिया गया इससे उनकी चरवाही और व्यापारिक गतिविधियाँ बुरी तरह प्रभावित हुईं 

सूखा और चरवाहे

प्राकृतिक आपदाएँ

जब चरागाह सूख जाते हैं और मवेशियों को नए इलाकों में जाने से रोका जाता है, तो भुखमरी का संकट पैदा हो जाता है 1933-34 के केवल दो साल के सूखे में मासाइयों के आधे से ज्यादा जानवर मर गए थे

सामाजिक असमानता

औपनिवेशिक सरकार ने मासाई समूहों के मुखिया नियुक्त किए, जो समय के साथ धनी हो गए और शहरों में बसकर व्यापार करने लगे इसके विपरीत, वे चरवाहे जो केवल अपने जानवरों पर निर्भर थे, युद्ध और अकाल के समय सब कुछ खो बैठे और उन्हें मजदूरी करने के लिए मजबूर होना पड़ा

निष्कर्ष

आज पर्यावरणविद् और अर्थशास्त्री यह मानने लगे हैं कि पहाड़ी और शुष्क इलाकों में जीवनयापन के लिए चरवाही ही सबसे व्यावहारिक और टिकाऊ रास्ता है चरवाहे अतीत के अवशेष नहीं हैं, बल्कि वे आधुनिक विश्व की बदलती परिस्थितियों के साथ खुद को ढालने वाले जीवंत समुदाय हैं वे आज भी अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं और जंगलों के रखरखाव में अपना हिस्सा मांग रहे हैं

 Important Questions 

❓ चरवाहे कौन होते हैं?

👉 जो पशुपालन करके जीवन यापन करते हैं।

❓ औपनिवेशिक शासन का क्या प्रभाव पड़ा?

👉 चरागाह कम हुए, कर बढ़ा, जीवन कठिन हुआ।

❓ मासाई कौन हैं?

👉 अफ्रीका का प्रमुख चरवाहा समुदाय





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